कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में ऐसे लोग भी कोरोना वॉरियर्स (योद्धा) बनकर सामने आए हैं, जो संक्रमित की मृत देह को अंतिम संस्कार स्थल तक पहुंचा रहे हैं। इन्होंने कई लोगों को मुखाग्नि दी तो कई को सुपुर्द-ए-खाक किया है। इन्हें खुद नहीं पता कि अब तक ये कितनों को मुखाग्नि दे चुके हैं और कितनों को सुपुर्द-ए-खाक किया है। कई बार ऐसी स्थिति बनती है कि कोरोना संक्रमित की मृत देह को उसके स्वजन मुखाग्नि देने या दफ्न करने से परहेज करते हैं। तब ये कोरोना वॉरियर्स मजहब की दीवारों से उठकर अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।
निभातें हैं अंतिम संस्कार की सारी जिम्मेदारी
हम बात कर रहे हैं इंदौर के अरबिंदो अस्पताल के मॉर्चूएरी विभाग के चार कर्मचारियों सोहनलाल खाटवा, जगदीश पटवाने, गोलू खरे और लखन खरे की। प्रशासन ने अरबिंदो अस्पताल को कोरोना के इलाज के लिए चुना तो इन चारों की जिम्मेदारी बढ़ गई। कोरोना संक्रमित व्यक्ति की इलाज के दौरान मृत्यु होने पर ये चारों ही मृत शरीर को अस्पताल से अंतिम संस्कार स्थल तक पहुंचाते हैं। वहां शव को चिता पर लेटाने से लेकर लकडि़यां जमाने तक की जिम्मेदारी इन्हीं को निभानी होती है।
अपने भी छोड़ देते हैं जब साथ
बकौल सोहनलाल कई बार चिता पर शव को लेटाने के बाद मृतक के स्वजन मुखाग्नि देने से इन्कार कर देते हैं। ऐसे में यह जिम्मेदारी भी उन्हें निभानी होती है। मृतक के स्वजन के पास पीपीई किट या संक्रमण से बचने के अन्य सुरक्षा संसाधन नहीं होने पर भी उन्हें ही अंतिम संस्कार करना पड़ता है। कई को कर चुके सुपुर्द-ए-खाक सोहनलाल, जगदीश, गोलू, लखन के मुताबिक उन्होंने कभी यह सोचकर काम नहीं किया कि मरने वाला हिंदू है या मुस्लिम।
जब अपने भी कब्र में नहीं उतरते
कई बार ऐसी स्थिति भी सामने आई कि मृतक के स्वजन शव को कब्र में उतारने से भी परहेज करते हैं। ऐसी स्थिति में इन्हीं चारों को शव कब्र में उतारना होता है। शव वाहन में भी नहीं बैठने देते सोहनलाल ने बताया कि कोरोना संक्रमित व्यक्ति की मौत होने पर हम उसके स्वजन को शव वाहन में नहीं बैठने देते क्योंकि इससे संक्रमण फैलने की आशंका रहती है। हम खुद शव के साथ अंतिम संस्कार स्थल तक जाते हैं। स्वजन से कह दिया जाता है कि वे अपने वाहनों से अंतिम संस्कार स्थल तक पहुंच जाएं। सोहनलाल का मकान अरबिंदो अस्पताल के सामने ही है, जबकि बाकी के तीनों साथी ग्राम रेवती में रहते हैं।
अस्पताल रखता है पूरा ध्यान
जगदीश और गोलू ने बताया कि शुरआत में उन्हें इस काम में संकोच हो रहा था। उन्हें डर था कि इस काम में वे भी संक्रमित हो जाएंगे, लेकिन अस्पताल के प्रबंधक राजीव सिंह ने उन्हें न सिर्फ सुरक्षा संसाधन उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया बल्कि इस कार्य को मानवता से जोड़कर देखने की प्रेरणा भी दी। अरबिंदो अस्पताल के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. विनोद भंडारी के आश्वासन के बाद वे इस काम को करने को तैयार हुए और अब मानवता की सेवा कर रहे हैं। चारों कर्मचारियों ने बताया कि अस्पताल प्रबंधन न केवल उन्हें संक्रमण से बचने के संसाधन दे रहा है, बल्कि उनके खाने-पीने सहित अन्य सुविधाओं का इंतजाम भी कर रहा है।